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स्वामी श्री हरिदास संगीत सम्मेलन का हुआ शुभारंभ

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वृन्दावन, विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी बिहारीपुरा स्थित ठा0 श्रीराधा सनेह बिहारी मंदिर प्रांगण में श्रीराधा प्राकट्योत्सव एवं अनन्य नृपति संगीत शिरोमणि ललितावतार स्वामी श्री हरिदास जी महाराज के आविर्भाव महोत्सव के अवसर पर अखिल भारतीय स्वामी श्री हरिदास संगीत एवं सांस्कृतिक सम्मेलन संस्थान द्वारा द्विदिवसीय अखिल भारतीय स्वामी श्री हरिदास संगीत सम्मेलन एवं स्वामी श्रीहरिदास संगीत कला रत्न सम्मान का आयोजन किया गया।
 इस भव्य संगीत आयोजन का उद्घाटन माननीय ब्रजमण्डल के सुप्रसिद्ध संत काष्र्णि श्रीगुरू शरणानंद जी महाराज ने स्वामी जी के चित्रपट पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्जवलित कर किया। अपने उद्बोधन में महाराज जी ने कहा कि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज संगीत के सर्वमान्य गुरू थे। उन्होंने संगीत की रसधारा प्रवाहित कर प्रेमतत्व के प्रतिवादन के साथ संगीत साधना के माध्यम से अपने आराध्य श्री बांके बिहारी जी महाराज का प्रकट्य कर विश्व को चमत्कृत कर दिया। स्वामी जी महाराज का सम्पूर्ण जीवन संगीत का पर्याय था। बडे़-बडे संगीतज्ञ उनके गायन के समक्ष नतमस्तक थे। मुझे इस पावन उत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से अपार आनन्द की अनुभूति हो रही है।
संस्थान के अध्यक्ष आचार्य अतुल कृष्ण गोस्वामी एवं कार्यक्रम संयोजक पं0 बिहारी लाल वशिष्ठ ने महाराज जी को ठाकुर जी की प्रसादी उत्तरीय उढ़ाकर सम्मान किया तथा ठा0 श्री बाके बिहारी जी का भव्य चित्रपट प्रदान किया।
इसके बाद प्रारम्भ हुआ संगीत समारोह श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के प्रति श्रद्धानवत कत्थक नृत्य के पुरोधा सुगलना बनर्जी, कोलकाता द्वारा
धमारताल अभिनय कर कत्थक नृत्य प्रस्तुत किया। उनकी इस मग्न मुग्ध प्रस्तुति पर सारा वातावरण शास्त्रीय संगीत में डूब गया। उपस्थित श्रोताओं ने तालियाँ बजाकर उनके नृत्य का स्वागत किया।
कत्थक नृत्य के बाद प्रस्तुत हुआ  विशाल मिश्रा बनारस द्वारा सितार वादन, सितार पर थिरकती अंगलिया और हृदय को स्पर्श करते स्वर जब तबले से बहस कर बैठते तो नजारा कुछ और ही दिखाई देता। सितार के स्वरों की तबले के साथ संगत का भरपूर आनन्द दर्शकों एवं श्रोताओं ने लिया, जब संगत का जोश चरम पर होता तो तालियों की गड़गड़ाहट से सारा संगीत सम्मेलन पण्डाल गुंजरित हो उठता। सितार के साथ तबला पर सुबोध भट्टाचार्य एवं पखावज पर रजनीश मिश्रा ने संगत दी।
इसके बाद कोलकाता से आई  शिल्पी बरूरी एवं उनके शिष्यों द्वारा स्वामी जी के समक्ष भरतनाट्यम नृत्य प्रस्तुत किया गया। भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को पल भर के लिए स्तब्ध कर दिया। नृत्य के माध्यम से अद्भुत प्रदर्शन कर खूब वाहवाही लूटी। संगीत की मधुर धुन गायकी के स्वर और पायलों की झंकृति ने इस महोत्सव की शोभा को बहुआयामी बना दिया।
स्वामी हरिदास जी चरणों में दिल्ली से आयी डाॅ0 श्रीमती कुसुम भट्ट जी ने सुन्दर शास्त्रीय संगीत गायन प्रस्तुत किया। छोड़ो- छोड़ो री गुईयाँ उनसे कौन लडे़, मेरे श्याम मुझे अपना लेना। उनके इस गायन से पूरा प्रांगण निधिवन मय हो गया। भट्ट जी के साथ तबले पर संगत पं0 दीनदयाल एवं हारमोनियम पर कवि भारतीय ने की।
इसके बाद दिल्ली से आये श्री आशुतोष वर्मा जी ने अद्भुत तबला वादन किया। तबले की थाप पर उनकी ऊँगलियाँ इस प्रकार चल रही थी मानो नृत्य कर रही हों। उनके तबला वादन पर उपस्थित श्रोताओं ने कई बार ताली बजाकर उनका उत्साहवर्धन किया।
रात्रि पर्यन्त चला यह संगीत नृत्य गायन एवं वादन का कार्यक्रम अपनी स्वर लहरियों से समूचे नगर को गुंजरित करता रहा। कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 उमेश शर्मा ने किया।
कार्यक्रम के अंत में संस्थान के अध्यक्ष आचार्य अतुल कृष्ण गोस्वामी कलाकारों को संगीत कलारत्न से सम्मानित किया।
इस अवसर पर आचार्य अतुल कृष्ण गोस्वामी, पं0 बिहारी लाल वशिष्ठ, भागवताचार्य नागेन्द्र दत्त गौड़, आचार्य बद्रीश, हरीकृष्ण सारस्वत, स्वामी देवकीनंदन, आचार्य रामविलास चतुर्वेदी, राधा बिहारी गोस्वामी, पं0 रमेश दत्त शर्मा, राम किशन गोस्वामी, विक्रम लवानिया, आलोक बंसल, पं0 राजेश पाठक, पं0 आशुतोष भारद्वाज, पं0 आशीष चतुर्वेदी, गोकुल चन्द्र गोस्वामी, डाॅ0 गोपाल चतुर्वेदी, पं0 युगल किशोर कटारे, पं0 अरविन्द गोस्वामी, पं0 प्रदीप गोस्वामी, पं0 अशोक गोस्वामी, पं0 संजय शर्मा, पं0 देवेन्द्र शर्मा, पं0 पीयूष शर्मा, गोविन्द शर्मा, पं0 कृष्ण मुरारी शर्मा, मयंक शर्मा, पं0 प्रदीप बनर्जी, पं0 सुधीर शुक्ला, परेश अधिकारी आदि लोग उपस्थित थे।

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